अब तो मंदिर-मस्जिद मे जाने का नही होता मन

 

अब तो मंदिरमस्जिद मे जाने का नही होता मन

इतना ही नही, उनके तरफ देखने से भी लगता है डर

न जाने किस के भीतर का पंडितमौलवी जाग जाये

गुस्से से भगा दे काफिर कहकर

 

डर डर के चढाता हूँ फूल मूर्तियो और मजारो पर

दबी आंखो से नजर रखता हू उनके रखवालो पर

सौ बार सोचता हू माथा टेकने और सजदा करने से पहले

कही आंच ना आ जाये ऐसा करने से किसी धरम पर

 

अब तो ऐसा लगने लगा है

मंदिर जावू तो भगवान मुझे भस्म न कर दे अपनी तिसरी आंख खोलकर

मस्जिद जावू तो अल्ला ना देखे मुझे मुँह टेढा कर

और चर्च जावू तो जिझस ना फेके अपना क्रॉस आगबबूला होकर मुझपर

 

अल्ला और भगवान एक है, उसकी सब पर निगाह है

ये तो साहब लगने लगा है झूठ

अब तो कुरान और गीता की आयतो को पढने से भी कतराते है ओठ

न जाने धर्म के ठेकेदार उसमे लिखी किस बात से ना जाये रूठ