मै मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर जानेवाला हू

 

मै मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर जानेवाला हू

वहा की चौखट चुम के

उस मालिक से

सुकून, अमन, चैन की कामना करनेवाला हू

 

मै काफिर नही

कि किसी के बहकावे मे आवू

और किसी के जात, धर्म को गाली दू

मै तो फ़क़ीर हू

अपनी कफनी सामने कर

दो वक़्त की रोटी और

बरकत की भिक मांगनेवाला हू

 

चाहे समाज मुझे अपने बिरादरी से निकाल डाले

मुझे उसकी पर्वा नही

मै धरमग्रंथ को तकिया समझकर सोनेवाला नही हू

मै तो रेगिस्थान मे गुल खिलानेवाला हू

गा के उस परवरदिगार के गुण

उसके अमन, शांती के बोलो को

ढोल, नगारे बजाकर सुनानेवाला हू